Ek Ikh ka Ped

Ganna, meri beti ka nick name hain…Aur Ganne par ye kavita….

मैं ईख का पेड़
हल्हलाते हुए खेतो में बढ़ा हुआ
समीपास्थों के आसपास, उनसे संरक्षित, सुरक्षित
लोगो के प्यार और स्नेह जल से सिंचित
लोगो की आशाओ और प्रार्थनाओ से प्रेरित
बढता रहा, गुमान करता रहा अपनी प्रगति पर
क्षितिज को देखा रहा हर सुबह
वो मिटटी की सोंधी गंध
जो अचानक बारिश से निकले धरा के स्वेद का अंग था
वो धूल भरा श्रृंगार
जो शाम धोरो के लौटने से माथ पर संग था
वो पंछियो के घर आने का शोर
जो कान ढकने के बहाने
पड़ोसन बाला के अंग लगने का अंग था

और यही समय था जब मेरे अन्दर
समां गयीं वो जीवन की मिठास, जीने की आस
अपनों की चाह, कुछ स्वप्नों की राह
और लो मेरा बचपन बीत गया

मैं सीख गया लू के थपेड़ो से बचना
गिरती धुँआधार बारिशो मैं पानी से ना गलना
मजबूती से धरा को पकड़कर हवाओ से बचना
आसपास के लोगो से मिलना, बिछुड़ना,

और लो योवन आ गया मैं बन गया “गन्ना”
साधन बन गया खेतिहर किसान की जीविका का
व्यापारियो की धन आकांशा का
मंडियों से मंडियों तक ट्रेक्टर पर होता रहा सवार
निकल गया भ्रमण पर , जिन्दगी-आचमन पर
डरने लगा लोगो से, सपनो से,
बन गया कठोर, ना बसेरा ना ठौर

छूट गएँ वो दिन जब मैं आसमान को देख कर गौरान्वित हो जाता था
जब खेतीहर मजदूर का सीना मेरी प्रगति पर गर्व से उठ जाता था
जब मेरा परिवार तालियो की गडगडाहट से मेरा जन्मदिवस मनाता था
जब मेरे आँसू को पूछने के लिए सूरज बादलो से निकलकर बहार आ जाता था

पर तुम मिलें और तुमने उठा लिया मुझे
दुकान के उस कौने से जहाँ मुझे शत विक्षत कर दिया था
मेरा अस्तित्व को कुचल दिया था
तुमने बताया मैं क्या हूँ
मेरे अन्दर मेरे रास का परिमाण
मेरे होने का अहसास
mere jeevan ki आस
मेरे जीवन वो छन जब मैं सब कुछ लूटाकर भी तुम्हारे बच्चों की चहक को महसूस करता रहा
तुम्हारे स्वाद ग्रंथियो को मचलते हुए देखा रहा

मैं निम्मित्त तुम्हारे जीवन जैसे ही
जितना रस लोगो इसका उतनी मिटास मिलेगी
तिजना स्वार्थ देखोगे इसमें उतनी कठोरता बनेगी
जितना आनंद बिख्राओगे उतनी प्रफुल्लता उपजेगी
जितना नेह लूताओगे उतनी समृध्दी बढ़ेगी
हर पल जियो मेरे सामान
अपने अन्दर के रस को सम्हाले
मित्रों के मेले में जीव सुधा उड़ेले
मैं निम्मित्त तुम्हारे जीवन जैसे ही ईख का पेड़

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